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पी.ए. ईनामदार बनाम महाराष्ट्र के राज्य के मामले (2005) 6 एससीसी 537 में, टी.एम.ए. पई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) 8 एससीसी 481 के मामले में निम्नलिखित अवलोकनों को धार्मिक अल्पसंख्यक के लिए लागू किया गया है: 

“………….यदि हां, तो ऐसी संस्था का एक दायित्व है कि अल्पसंख्यक समुदाय में आने वाले समूह के अधिक से अधिक विद्यार्थियों को प्रवेश दें। अत: जिस राज्य में संस्था स्थित है उस राज्य में निवास करने वाले इस समूह के विद्यार्थियों को बड़े पैमाने पर प्रवेश अवश्य दिया जाए क्योंकि जहां तक राज्य का संबंध है वे भाषाई अल्पसंख्यक समूह का गठन करते हैं। दूसरे शब्दों में जिस राज्य में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना की गई है उसमें भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय के अधिक से अधिक विद्यार्थी मौजूद होने चाहिए। ऐसी संस्थाओं के प्रबंधन निकाय आसपास के राज्यों में बहुमत वाले भाषाई विद्यार्थियों के प्रवेश करने के लिये अनुच्छेद 30 (1) के अंतर्गत दिए गए सुरक्षा के तहत नहीं ले सकते हैं।

माननीय (लॉर्डशिप) के अनुसार, "यदि कोई अन्य दृष्टिकोण अनुच्छेद 30 (1) और 29 (2) के तहत सौहार्दपूर्वक समझ के अनुरूप मानते हुए लिया जाता होता तो यह वरीयता के आधार पर दाखिला के लक्ष्य को विरुपित करता। ईनामदार के मामले में आगे अवलोकन किया गया था कि "यह टी.एम.ए. पई फाउंडेशन में दिए गए कानून से यह निश्चित रूप से प्रतिपादित होता है कि एक अल्पसंख्यक संस्थान की स्थापना कर संस्था को मुख्यत रूप से राज्य के अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए अन्यथा अल्पसंख्यक संस्था का अपना स्वरूप(करेक्टर) खो जाता है। केरल शिक्षा विधेयक में मुख्य न्यायाधीश एस.आर.दास के शब्दों में “गैर अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों के अनुरूप उसी मानक पर अन्य अन्य राज्यों के बहुमत की उपस्थिति मान्य है और यह एक अल्पसंख्यक संस्था को उसके आवश्यक स्वरूप(करेक्टर) से वंचित नहीं करता है।

कानून के बारे कहे गए आधार को ध्यान में रखते हुए, आयोग इस बात पर जोर देता है कि सोसायटी अथवा न्यास विलेख के एसोसिएशन के ज्ञापन (एमओए) में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि सोसायटी/न्या‍स का उद्देश्य  "मुस्लिम/सिख/क्रिश्चियन/बौद्ध/पारसी/जैन(जैसा भी मामला हो) समुदाय और बड़े पैमाने पर समाज को भी लाभान्वित करने हेतु प्रारंभिक रूप से शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं संचालन करना है"।

जब आयोग को आवेदन कर रहे हों तो यह सुनिश्चित किया जाए कि एम.ओ.ए / न्यास विलेख स्पष्ट रूप से उपर्युक्त उद्देश्य का उल्लेख हो।


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