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  1. वर्ष 2004 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग की स्थापना की गई थी। आयोग की स्थापना करने के लिए नवंबर 2004 में सरकार एक अध्यादेश लायी। इसके बाद दिसंबर 2004 में संसद में एक विधेयक लाया गया और दोनों सदनों में विधेयक को पारित किया गया। जनवरी 2005 में एन.सी.एम.ई.आई. अधिनियम को अधिसूचित किया गया था। प्रधानमंत्री के नए 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यकों के कल्याण हेतु लक्ष्यि निश्चित गए जिन्हें एक विशिष्ट समय सीमा में पूरा करना होता है। उच्च प्राथमिकता के आधार पर शिक्षा के लिए अवसर में बढ़ोत्तरी की जाती है। 
     
  2. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्था की स्थापना एवं संचालन करने के लिए तथा उनके अधिकारों के वंचन अथवा उल्लंघन के संबंध में विशिष्ट शिकायतों पर विचार करने के लिये आयोग अधिकृत है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 30 में प्रतिष्ठापित है जिसमें कहा गया है कि “किसी भी धर्म अथवा भाषा के सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्था ओं की स्थापना करने एवं संचालन करने का अधिकार होगा”। 
     
  3. इस प्रकार, अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं संचालन करने के लिए तथा उनके अधिकारों के वंचन एवं उल्लंघन के संबंध में किसी भी शिकायत पर आयोग विचार कर सकता है।
     
  4. यह आयोग अर्ध-न्यायिक निकाय है और सिविल न्यायालय की शक्तियों से संपन्न है। इसकी अध्यक्षता अध्यक्ष द्वारा की जाती है जो उच्च न्या यालय में न्यायधीश रहा हो। केंद्र सरकार द्वारा इसके तीन सदस्य् नामित किए जाते हैं। आयोग की 3 भूमिकाएं होती हैं जैसे न्यायिक कार्य (फंक्शन), परामर्श कार्य एवं सिफारिशी शक्तियां ।
     
  5. एक विश्वविद्यालय के लिए अल्पसंख्यंक शैक्षणिक संस्था की सम्बद्धता के संबंध में आयोग का निर्णय अंतिम होगा।
     
  6. आयोग को प्रेषित किसी भी प्रश्न पर, जो अल्पसंख्यकों की शिक्षा से संबंधित हो, आयोग केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकारों को परामर्श देने के लिए अधिकृत है। 
     
  7. आयोग अनुच्छेद 30 में निहित अल्पसंख्यक समुदाय को उनके शैक्षिणिक अधिकारों से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से वंचन संबंधी किसी भी मामले में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों को सिफारिश कर सकता है।
     
  8. आयोग के सशक्तिकरण ने अल्पंसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को उनकी शिकायतों को उजागर करने एवं तत्परता से राहत पाने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है। याचिका/शिकायत संबंधी मामलों के अधीन राज्य सरकारों द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन.ओ.सी.) नहीं जारी करना, अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन.ओ.सी.) को जारी करने में विलम्ब/अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं के लिए अल्पसंख्यक दर्जा (स्टेटस) जारी करने में अस्वीकृति/विलंब, अल्पसंख्यकों को नए महाविद्यालयों/विद्यालयों/संस्थानों को खोलने की अनुमति न देना, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं में अतिरिक्त पाठ्यक्रम की अनुमति न देना, सहायता अनुदान की अस्वी‍कृति, वित्तीय सहायता देने हेतु अस्वीकृति, संस्थान के विद्यार्थियों की संख्या मॆं वृद्धि होने के बावजूद अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षकों के नए पदों के सृजन की अनुमति देने से इनकार करना, शिक्षकों की नियुक्ति का अनुमोदन देने से इनकार करना, सरकारी विद्या‍लय के शिक्षकों की तुलना में अल्पसंख्यक विद्यालयों के शिक्षकों के वेतनमान में असमानता, सरकारी संस्थाओं के बराबर अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को शिक्षण सहायता और अथवा अन्य, सुविधाएं जैसे कंप्यूटर्स, पुस्तकालय, प्रयोगशाला इत्या्दि देने से इनकार करना, उर्दू विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए सभी विषयों में उर्दू की पुस्तककों की अनुपलब्धता, उर्दू जानने वाले शिक्षकों की नियुक्ति नहीं करना, मदरसा कर्मचारियों को अपर्याप्त भुगतान, मदरसा को अनुदान जारी न करना, अल्पसंख्यक विद्यालयों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान न करना, अल्प‍संख्यक संस्थान विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों आदि को सर्वशिक्षा अभियान का विस्तार देने से वंचित रखना इत्यादि मामले आते हैं ।

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